महेश नवमी 30 मई, 2012 (बुधवार) को : माहेश्वरी जाति का उत्पति दिवस.....
मयाध्यछेन्न प्रकृति: सूयते सचराचरम l हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ll (गीता अ.६/१०).
(मुझ अधिष्ठाता संकास से प्रकृति चर-अचर सहित सर्वजगत को रचती है l हे कौन्तेय ! इस हेतु यह संसार आवागमन रूप चक्र में घूमता है l
माहेश्वरी जाति का उत्पति-प्रकाश.....
सूर्यवंशी राजाओं में चौहान जाति के खड्गल सेन राजा खंडेला नगर में राज्य करते थे l वाह बड़े दयालु और न्यायप्रिय थे l उनके राज्य में प्रजा बड़े सुख से रहती थी l मृग और मृगराज एक घाट में पानी पीते थे l राजा को हमेशा एक ही चिन्ता रहती थी कि उनके एक भी पुत्र नहीं था l एक समय राजा ने बड़े आदर भाव से जगतगुरु ब्राह्मणों को अपने यहाँ बुलाकर बड़ा सत्कार किया l राजा की सेवा भक्ति से ब्राह्मण लोग बड़े संतुष्ट हुए l ब्राह्मणों ने राजा को वर मांगने को कहा l तब राजा ने कहा कि मेरे पुत्र नहीं है, कृपा करके मेरी इच्छा पूरी करायें l तब ब्राह्मणों ने राजा से कहा कि यदि आप भगवान् शिव की उपासना करोगे तो आपको एक होनहार, पराक्रमी और चक्रवर्ती पुत्र प्राप्त होगा, परन्तु उसे सोलह वर्ष तक उत्तर दिशा में मत जाने देना और जो उत्तर दिशा में 'सूर्य कुण्ड' है, उसमें स्नान मत करने देना l यदि वाह ब्राह्मणों से द्वेष नहीं करेगा तो चक्रवर्ती राज करेगा, अन्यथा इसी देह से पुनर्जन्म लेगा l इस प्रकार ब्राह्मणों का आशीर्वाद प्राप्त कर राजा बड़ा प्रसन्न हुवा l राजा ने उनको वस्त्र, आभूषण, गाय आदि देकर प्रसन्नचित विदा किया l राजा के चौबीस रानियाँ थी l कुछ समय बाद उनके एक रानी चम्पावती के पुत्र जन्म हुवा l राजा ने बड़ा आनन्द मनाया और नवजात शिशु का नाम सुजान कुँवर रखा l सात वर्ष का होते ही राजकुमार घोड़े पर चढ़ना, शस्त्र चलाना सीख गया l जब वह बारह वर्ष का हुवा तो शत्रु लोग उससे डरने लगे l वाह चौदह विद्या पढ़कर होशियार हो गया l राजा उसके काम को देखकर संतुष्ट हुए l राजा ने इस बात का ध्यान रखा कि सुजान कुँवर उत्तर दिशा में न जाने पाये l
मयाध्यछेन्न प्रकृति: सूयते सचराचरम l हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ll (गीता अ.६/१०).
(मुझ अधिष्ठाता संकास से प्रकृति चर-अचर सहित सर्वजगत को रचती है l हे कौन्तेय ! इस हेतु यह संसार आवागमन रूप चक्र में घूमता है l
माहेश्वरी जाति का उत्पति-प्रकाश.....
सूर्यवंशी राजाओं में चौहान जाति के खड्गल सेन राजा खंडेला नगर में राज्य करते थे l वाह बड़े दयालु और न्यायप्रिय थे l उनके राज्य में प्रजा बड़े सुख से रहती थी l मृग और मृगराज एक घाट में पानी पीते थे l राजा को हमेशा एक ही चिन्ता रहती थी कि उनके एक भी पुत्र नहीं था l एक समय राजा ने बड़े आदर भाव से जगतगुरु ब्राह्मणों को अपने यहाँ बुलाकर बड़ा सत्कार किया l राजा की सेवा भक्ति से ब्राह्मण लोग बड़े संतुष्ट हुए l ब्राह्मणों ने राजा को वर मांगने को कहा l तब राजा ने कहा कि मेरे पुत्र नहीं है, कृपा करके मेरी इच्छा पूरी करायें l तब ब्राह्मणों ने राजा से कहा कि यदि आप भगवान् शिव की उपासना करोगे तो आपको एक होनहार, पराक्रमी और चक्रवर्ती पुत्र प्राप्त होगा, परन्तु उसे सोलह वर्ष तक उत्तर दिशा में मत जाने देना और जो उत्तर दिशा में 'सूर्य कुण्ड' है, उसमें स्नान मत करने देना l यदि वाह ब्राह्मणों से द्वेष नहीं करेगा तो चक्रवर्ती राज करेगा, अन्यथा इसी देह से पुनर्जन्म लेगा l इस प्रकार ब्राह्मणों का आशीर्वाद प्राप्त कर राजा बड़ा प्रसन्न हुवा l राजा ने उनको वस्त्र, आभूषण, गाय आदि देकर प्रसन्नचित विदा किया l राजा के चौबीस रानियाँ थी l कुछ समय बाद उनके एक रानी चम्पावती के पुत्र जन्म हुवा l राजा ने बड़ा आनन्द मनाया और नवजात शिशु का नाम सुजान कुँवर रखा l सात वर्ष का होते ही राजकुमार घोड़े पर चढ़ना, शस्त्र चलाना सीख गया l जब वह बारह वर्ष का हुवा तो शत्रु लोग उससे डरने लगे l वाह चौदह विद्या पढ़कर होशियार हो गया l राजा उसके काम को देखकर संतुष्ट हुए l राजा ने इस बात का ध्यान रखा कि सुजान कुँवर उत्तर दिशा में न जाने पाये l