तन्त्रसार के अनुसार श्रीगणेश
'तन्त्रसार के द्वितीय परिच्छेद में विभिन्न गाणपत्य-सम्प्रदायों के उपास्य (१) महागणेश, (२) हेरम्बगणेश, (३) हरिद्रागणेश, (४) उच्छिष्टगणेश के मन्त्र, ध्यान-पूजा और प्रयोगविधि विस्तृत रूप से वर्णित हैं। गाणपत्य-सम्प्रदाय की छः शाखाओं में से चार शाखाओं की पूजा-पद्धति की एक झलक संक्षेप में यहाँ प्रस्तुत की जा रही है।
(१) महागणेश या महागणपति —
'तन्त्रसार ' में महागणेश के विविध ध्यान और मन्त्र दीख पड़ते हैं —
(क) महागणपति दशभुज और रक्त-वर्ण के हैं तथा (ख) प्रकारान्तर से महागणपति चतुर्भुज और गौरवर्ण भी हैं।
महागणपतिलोक — 'तन्त्रसार’में ‘महागणपति-लोक' का निम्नोक्त वर्णन देखा जाता है —
नवरत्नमयं द्वीपं स्मरेदिक्षुरसाम्बुधौ ।
तद्वीचिधौतपर्यन्तं मन्दमारुतसेवितम् ॥
मन्दारपारिजातादिकल्पवृक्षलताकुलम् ।
उद्भूतरत्नच्छायाभिररुणीकृतभूतलम् ॥
उद्यद्दिनकरेन्दुभ्यामुद्भासितदिगन्तरम् ।
तस्य मध्ये पारिजातं नवरत्नमयं स्मरेत् ॥
ऋतुभिः सेवितं षड्भिरनिशं प्रीतिवर्द्धनैः ।
तस्याधस्तान्महापीठे रचिते मातृकाम्बुजे ॥
षट्कोणान्तस्त्रिकोणस्थं महागणपतिं स्मरेत् ॥
(द्वितीय परिच्छेद में उद्धृत 'शारदातिलक' १३ । ३२–३४)
'साधक ध्यान में देखे कि इक्षुरसमय सिन्धु में नवरत्नमय द्वीप है। इस द्वीप का प्रान्तभाग उस सिन्धु की लहरों से प्रक्षालित और मन्द मन्द समीरण से परिसेवित है तथा वह मन्दार, पारिजात और कल्पवृक्ष की लता आदि से परिपूर्ण है। उद्भूत रत्नों की कान्ति से उस द्वीप का भूतल अरुणीकृत है तथा उदीयमान सूर्य और चन्द्र के द्वारा दिग्-दिगन्तर आलोकित है । उस द्वीप के मध्यभाग में नवरत्नमय पारिजात-वृक्ष का चिन्तन करे। उस स्थान की प्रीतिवर्धिनी छः ऋतुएँ निरन्तर सेवा करती हैं। उस पारिजातवृक्ष के नीचे एक महापीठ है। उसके ऊपर पंचाशत्-मातृका (वर्ण)-मय कमल अंकित है। उसकी कर्णिका में षट्कोण है और उसके भीतर एक त्रिकोणमण्डल है, जिसमें महागणपति विराजमान हैं, उनका स्मरण करे ।'
(क) दशभुज, रक्तवर्ण महागणपति का ध्यान इस प्रकार है —
हस्तीन्द्राननमिन्दुचूडमरुणच्छायं त्रिनेत्रं
रसादाश्लिष्टं
प्रियया सपद्मकरया स्वाङ्कस्थया संततम् ।
वीजापूरगदाधनुस्त्रिशिखयुक्चक्राब्जपाशोत्पल-
व्रीह्यग्रस्वविषाणरत्नकलशान् हस्तैर्वहन्तं भजे ॥
( तन्त्रसार, परि० २; शा० ति० १३ | ३६)
'श्रीमहागणपति का मुख श्रेष्ठ हाथी का है। उनके सिर में अर्द्धचन्द्र विराजित है । उनके देह की कान्ति अरुणवर्ण की है। वे त्रिनयन हैं और अपनी गोद में स्थित पद्महस्ता प्रिया के द्वारा सप्रेम आलिंगित हैं। वे दस भुजाओं में क्रमशः दाडिम, गदा, धनुष, त्रिशूल, चक्र, पद्म, पाश, उत्पल, धान्यगुच्छ, स्वदन्त और रत्नकलश धारण किये हुए हैं; इस प्रकार के महागणपति का ध्यान करें।'
गण्डपालीगलद्दानपूरलालसमानसान् ।
द्विरेफान् कर्णतालाभ्यां वारयन्तं मुहुर्मुहुः ॥
कराग्रधृतमाणिक्यकुम्भवक्त्रविनिःसृतैः ।
रत्नवर्षैः प्रीणयन्तं साधकान् मदविह्वलम् ।
माणिक्यमुकुटोपेतं रत्नाभरणभूषितम् ॥
(तन्त्रसार, परि० २ तथा शा० ति० १३ । ३७-३८)
'महागणपति के गण्डयुगल से जो मदप्रवाह झर रहा है, उसका पान करने की लालसा से युक्त भ्रमरसमूह निरन्तर उसके चारों ओर भ्रमण करता रहता है। वे कर्ण-संचालन के द्वारा उन भ्रमरों का बारंबार निवारण करते रहते हैं। वे अपने हाथ के अग्रभाग में धारण किये हुए माणिक्य-कुम्भ से विनिस्सृत रत्नों की वर्षा के द्वारा साधकों को परितृप्त करते हैं। वे स्वयं मदविह्वल रहते हैं। उनके मस्तक पर माणिक्यनिर्मित मुकुट विराजित हैं और उनके सर्वांग रत्नाभरणों से भूषित हैं। महागणपति के इस रूप का मैं ध्यान करता हूँ।'
उपर्युक्त ध्यानसम्मत महागणपति का अष्टाविंशति अक्षरों का मन्त्र है —
'ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं गं गणपतये वर वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा ।'
(ख) महागणपति का ध्यान —
इसमें मुक्ता के समान गौरवर्ण, चतुर्भुज गजानन का क्रोध में स्थित शक्तिसहित ध्यान
करते हुए द्वादशाक्षर-मन्त्र के जप का विधान है —
'ॐ ह्रीं गं ह्रीं महागणपतये स्वाहा ।'
उपर्युक्त ध्यानसम्मत महागणपति एकादशाक्षर- मन्त्र है —
ॐ ह्रीं गं ह्रीं वशमानय स्वाहा ।'
(२) हेरम्बगणपति —
'तन्त्रसार' में हेरम्ब गणपति के भी दो प्रकार के ध्यान और मन्त्र हैं —
(क) पंचहस्तिमुख, दशभुज और सिंहवाहन तथा
(ख) चतुर्भुज - हेरम्ब ।
(क) हेरम्बगणपति का ध्यान इस प्रकार है —
मुक्ताकाञ्चननीलकुन्दघुसृणच्छायैस्त्रिनेत्रान्वितै-
र्नागास्यैर्हरिवाहनं शशिधरं हेरम्बमर्कप्रभम् ।
दृप्तं दानमभीतिमोदकरदान् टङ्कं शिरोऽक्षात्मिकां
मालां मुद्गरमङ्कुशं त्रिशिखिकं दोर्भिर्दधानं भजे ॥
(तन्त्रसार, परि० २, शा० ति० १३ । १०९)
'हेरम्बगणपति पाँच हस्तिमुखों से युक्त हैं। चार हस्तिमुख चारों ओर और एक ऊर्ध्व
दिशा में है। उनका ऊर्ध्व हस्तिमुख मुक्तावर्ण का है। दूसरे चार हस्तिमुख क्रमशः
काञ्चन, नील, कुन्द (श्वेत) और कुंकुमवर्ण के हैं। प्रत्येक हस्तिमुख तीन नेत्रों
वाला है। वे सिंह वाहन हैं। उनके कपाल में चन्द्रमा विराजित है और देह की कान्ति
सूर्य के समान प्रभायुक्त है। वे बलदृप्त हैं और अपनी दस भुजाओं में वर और
अभयमुद्रा तथा क्रमशः मोदक, दन्त, टंक, सिर, अक्षमाला, मुद्गर, अंकुश और त्रिशूल
धारण करते हैं। मैं उन भगवान् हेरम्ब को भजता हूँ।'
उक्त ध्यानसम्मत हेरम्बगणपति का चतुरक्षर-मन्त्र है —
'ॐ गूं नमः ।'
'तन्त्रसार के चतुर्थ परिच्छेद में जो 'गणेशस्तोत्र' मिलता है,
उसमें हेरम्बकत्व की भावना इस प्रकार व्यक्त हुई है —
मदोल्लसत्पञ्चमुखैरजस्त्रमध्यापयन्तं सकलागमार्थान् ।
देवानृषीन् भक्तजनैकमित्रं हेरम्बमर्कारुणमाश्रयामि ॥
(तन्त्रसार, परि० २ तथा शा० ति० १३ । ४१)
'जो मदोल्लसित पञ्चमुखों द्वारा देवता और ऋषियों को निरन्तर सारे आगमों का अर्थ
पढ़ाते रहते हैं, भक्तों के एकमात्र परम मित्र हैं और सूर्य के समान अरुणवर्ण हैं,
उन हेरम्बदेव का मैं आश्रय लेता हूँ ।'
(ख) हेरम्बगणपति का प्रकारान्तर से ध्यान —
'तन्त्रसार' (परिच्छेद, हेरम्ब-मन्त्र ) - में चतुर्भुज हेरम्ब के इस प्रकार ध्यान
और मन्त्र प्राप्त होते हैं —
पाशाङ्कुशौ कल्पलतां विषाणं दधत्सुशुण्डाहितबीजपूरः ।
रक्तस्त्रिनेत्रस्तरुणेन्दुमौलिर्हारोज्ज्वलो हस्तिमुखोऽवताद् वः ॥
'हेरम्बगणपति की चार भुजाओं में क्रमशः पाश, अंकुश, कल्पलता और गजदन्त हैं। उनकी
सूँड़ के ऊपर एक दाडिमफल है। उनका शरीर रक्तवर्ण का है। वे त्रिनयन हैं और उनके सिर
पर तरुणचन्द्र सुशोभित है । गले में उज्ज्वल हार प्रकाशित हो रहा है। वे गजानन
हेरम्बदेव तुम्हारी रक्षा करें।'
उपर्युक्त ध्यानसम्मत चतुर्भुज हेरम्ब का दशाक्षर-मन्त्र है —
'गं क्षिप्रप्रसादनाय नमः ।'
(३) हरिद्रागणपति —
'तन्त्रसार' के द्वितीय परिच्छेद में हरिद्रागणपति के निम्नांकित ध्यान और मन्त्र
प्राप्त होते हैं —
हरिद्राभं चतुर्बाहुं हारिद्रवसनं विभुम् ।
पाशाङ्कुशधरं देवं मोदकं दन्तमेव च ॥
'हरिद्रागणपति' का शरीर पीतवर्ण का है। वे चतुर्भुज हैं तथा हरिद्रारंजित वस्त्र ही
धारण भी करते हैं। उनके चारों हाथों में क्रमशः पाश, अंकुश, मोदक और दन्त विराजित
हैं ।'
हरिद्रागणपति का एकाक्षर मन्त्र है —
'ग्लम्' ।
'तन्त्रसार 'के चतुर्थ परिच्छेद में 'हरिद्रागणपति 'का कवच भी उपलब्ध होता है।
(४) उच्छिष्टगणपति —
'तन्त्रसार' के द्वितीय परिच्छेदमें गाणपत्य-सम्प्रदाय के अन्तर्गत उच्छिष्टगणपति
का ध्यान, मन्त्र, पूजा और प्रयोगविधि प्राप्त होती है। उच्छिष्टगणपति चतुर्भुज और
रक्तवर्ण हैं। उनका ध्यान इस प्रकार है —
रक्तमूर्ति गणेशं च सर्वाभरणभूषितम् ।
रक्तवस्त्रं त्रिनेत्रं च रक्तपद्मासने स्थितम् ॥
चतुर्भुजं महाकायं द्विदन्तं सस्मिताननम् ।
इष्टं च दक्षिणे हस्ते दन्तं च तदधः करे ॥
पाशाङ्कुशौ च हस्ताभ्यां जटामण्डलवेष्टितम् ।
ललाटं चन्द्ररेखाढ्यं सर्वालङ्कारभूषितम् ॥
'उच्छिष्टगणपति की मूर्ति रक्तवर्ण तथा सब प्रकार के आभूषणों से सुशोभित है। उनके
परिधेय वस्त्र रक्तवर्ण हैं। वे त्रिनयन हैं और रक्तवर्ण के पद्मासन पर आसीन हैं।
उनके चार हाथ हैं, शरीर विशाल है, दो दन्त हैं और मुख पर हास्यछटा है। उनके
दक्षिणभाग के ऊपर वाले हाथ में वरमुद्रा और निचले हाथ में एक दन्त का दर्शन होता
है। वामभाग के ऊपर वाले हाथ में पाश तथा निचले हाथ में अंकुश विद्यमान है। उनका सिर
जटामण्डल से वेष्टित है तथा उनके ललाट पर अर्द्धचन्द्र सुशोभित है। वे सब प्रकार के
अलंकारों से विभूषित हैं ।'
उच्छिष्टगणपति का मन्त्र है —
'ॐ हस्ति पिशाचिनि खे स्वाहा।'
'तन्त्रसार' में उच्छिष्टगणपति की पूजा-विधि के विषय में लिखा है कि उच्छिष्टमुख से और अशुचि-अवस्था में ही इस देवता के मन्त्र-जप और पूजा आदि कार्य किये जाते हैं। किसी-किसी तन्त्र के मत से इस देवता की आराधना में पूजा नहीं करनी पड़ती, केवल मानसिक जप ही करना होता है। गर्गमुनि कहते हैं कि 'इनका साधक निर्जन वन में बैठकर रक्तचन्दन से लिप्त ताम्बूल चबाते हुए इनकी पूजा करे ।' दूसरे तन्त्र के मत से देवता की अर्चना करके मोदक चबाते हुए मन्त्र जप करना पड़ता है । भृगुमुनि का मत है कि 'उच्छिष्टगणपति की आराधना में फल खाते हुए जप करे ।'
उच्छिष्टगणपति-पूजन का माहात्म्य इस प्रकार कहा गया है —
राजद्वार पर, अरण्य, सभा, गोत्र-समाज, विवाद, व्यवहार, युद्ध, शत्रुसंकट, नौका,
कानन और द्यूतकार्य में, विपद् के समय, ग्रामदाह तथा चौरभय में, सिंह-व्याघ्र आदि
के भय के समय उच्छिष्टगणपति का मन्त्र जप करने से सब विघ्न दूर हो जाते हैं। इस
मन्त्र से दस सहस्र होम करने पर राजा तत्काल वशीभूत होता है। उक्त मन्त्र का एक
कोटि जप करने पर साधक को अणिमा आदि अष्ट सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, उसमें आकाशगमन
की शक्ति उत्पन्न होती है तथा सर्वज्ञता की प्राप्ति होती है।
हेरम्बगणपति-सम्प्रदाय, स्वर्णगणपति-सम्प्रदाय एवं संतान-गणपति-सम्प्रदाय के उपासकों की पूजा-पद्धति सामान्यतः वैदिक विधान के अनुसार देखने में आती है।
साभार उद्धृत - कल्याण 'गणेश अंक'

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