श्रीगणेशप्रिय चतुर्थी व्रत— माहात्म्य एवं व्रत विधि
शिवपुराण की कथा है — श्वेतकल्प में जब भगवान् शंकर के अमोघ त्रिशूल से पार्वतीनन्दन दण्डपाणि का मस्तक कट गया, तब पुत्रवत्सला जगज्जननी शिवा अत्यन्त दुःखी हुईं। उन्होंने बहुत—सी शक्तियों को उत्पन्न किया और उन्हें प्रलय मचाने की आज्ञा दे दीं। उन परम तेजस्विनी शक्तियों ने सर्वत्र संहार करना प्रारम्भ किया। प्रलय का दृश्य उपस्थित हो गया। देवगण हाहाकार करने लगे। तब समस्त भयनाशिनी जगदम्बा को प्रसन्न करने के लिये देवताओं ने उत्तर दिशा से हाथी का सिर लाकर शिवा—पुत्र के धड़ से जोड़ दिया। महेश्वर के तेज से पार्वती का प्रिय पुत्र जीवित हो गया। अपने पुत्र गजमुख को जीवित देखकर त्रैलोक्यजननी शिवा अत्यन्त प्रसन्न हुईं। उस समय दयामयी पार्वती को प्रसन्न करने के लिये ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि सभी देवताओं ने वहीं गणेश को ‘सर्वाध्यक्ष’ घोषित कर दिया।
