श्रीगणेशप्रिय चतुर्थी व्रत

 श्रीगणेशप्रिय चतुर्थी व्रत— माहात्म्य एवं व्रत विधि 

शिवपुराण की कथा है — श्वेतकल्प में जब भगवान् शंकर के अमोघ त्रिशूल से पार्वतीनन्दन दण्डपाणि का मस्तक कट गया, तब पुत्रवत्सला जगज्जननी शिवा अत्यन्त दुःखी हुईं। उन्होंने बहुत—सी शक्तियों को उत्पन्न किया और उन्हें प्रलय मचाने की आज्ञा दे दीं। उन परम तेजस्विनी शक्तियों ने सर्वत्र संहार करना प्रारम्भ किया। प्रलय का दृश्य उपस्थित हो गया। देवगण हाहाकार करने लगे। तब समस्त भयनाशिनी जगदम्बा को प्रसन्न करने के लिये देवताओं ने उत्तर दिशा से हाथी का सिर लाकर शिवा—पुत्र के धड़ से जोड़ दिया। महेश्वर के तेज से पार्वती का प्रिय पुत्र जीवित हो गया। अपने पुत्र गजमुख को जीवित देखकर त्रैलोक्यजननी शिवा अत्यन्त प्रसन्न हुईं। उस समय दयामयी पार्वती को प्रसन्न करने के लिये ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि सभी देवताओं ने वहीं गणेश को ‘सर्वाध्यक्ष’ घोषित कर दिया।

तन्त्रसार के अनुसार श्रीगणेश

 तन्त्रसार के अनुसार श्रीगणेश

'तन्त्रसार के द्वितीय परिच्छेद में विभिन्न गाणपत्य-सम्प्रदायों के उपास्य (१) महागणेश, (२) हेरम्बगणेश, (३) हरिद्रागणेश, (४) उच्छिष्टगणेश के मन्त्र, ध्यान-पूजा और प्रयोगविधि विस्तृत रूप से वर्णित हैं। गाणपत्य-सम्प्रदाय की छः शाखाओं में से चार शाखाओं की पूजा-पद्धति की एक झलक संक्षेप में यहाँ प्रस्तुत की जा रही है।

(१) महागणेश या महागणपति
'तन्त्रसार ' में महागणेश के विविध ध्यान और मन्त्र दीख पड़ते हैं —

(क) महागणपति दशभुज और रक्त-वर्ण के हैं तथा (ख) प्रकारान्तर से महागणपति चतुर्भुज और गौरवर्ण भी हैं।

महागणपतिलोक — 'तन्त्रसार’में ‘महागणपति-लोक' का निम्नोक्त वर्णन देखा जाता है —

नवरत्नमयं द्वीपं स्मरेदिक्षुरसाम्बुधौ ।
तद्वीचिधौतपर्यन्तं मन्दमारुतसेवितम् ॥
मन्दारपारिजातादिकल्पवृक्षलताकुलम् ।
उद्भूतरत्नच्छायाभिररुणीकृतभूतलम् ॥
उद्यद्दिनकरेन्दुभ्यामुद्भासितदिगन्तरम् ।
तस्य मध्ये पारिजातं नवरत्नमयं स्मरेत् ॥
ऋतुभिः सेवितं षड्भिरनिशं प्रीतिवर्द्धनैः ।
तस्याधस्तान्महापीठे रचिते मातृकाम्बुजे ॥
षट्कोणान्तस्त्रिकोणस्थं महागणपतिं स्मरेत् ॥

(द्वितीय परिच्छेद में उद्धृत 'शारदातिलक' १३ । ३२–३४)

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